Monday, 20 August 2012

धोबऊ नाच की यात्रा और इसकी पारंपरिक शैली.....


     
                         सभ्यता के विकास में वातावरण के अनुकूल मानव की क्रियाकलाप से उत्पन्न ऊर्जा संस्कृति का निर्माण करती है एवं यह संस्कृति विकास तथा व्यवहार की रीढ़ होती है। हमारे देश में व्याप्त विभिन्न संस्कृतियाँ, हमारी सूक्ष्म सौंदर्यशास्त्रीय मानसिकताओं को दर्शाती है और यह हमारी श्रेष्ठतम विशेषतओं की एक इकार्इ भी है कि विभिन्नता में एकता की ऊर्जा प्रवाहित करती हमारे देश की संस्कृति अनोखी है।
     इन संस्कृतियों को हमारे व्यवहार में गुढ़तम रूप से प्रकाशित करने का एक सर्वश्रेष्ठ माध्यम कला परंपरा भी है। जिसकी संस्कृतियों की तरह ही अनेक शाखा-प्रशाखाएs हमारे सामाजिक जीवन में व्याप्त हैं।
     कला परंपरा के रूपों में विभिन्नता को दर्शाते जातिगत वर्गीकरणों पर भी भारतीय कला-संस्कृति का एकमय सूत्र रहा है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ उत्तर भारत में भी पारंपरिक कला सम्पदा अपना मजबूत असितत्व रखती है।
     कलात्मक व्यवहार सदी से दूसरी सदी तथा पीढ़ी दर पीढ़ी की यात्रा करती है। यह यात्रा ही परंपरा है जिसकी विशाल लम्बी यात्रा की अपनी अनुठी कहानियाँ है। जो अपने प्रत्येक पीढ़ी में राजनैतिक विधटनों से मूल्यों के लिए जूझते हुए अपना उम्र बढ़ाती रहती है। कभी-कभी इसमें गति को आहत भी होना पड़ता है, अपने समय के विघटनों से प्रभावित होकर पर इसकी उम्र गति बढ़ती ही रहती है।
     उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र तथा बिहार के सीमावर्ती इलाकों की कला परंपरा धोबऊ नाच अपने यात्रा के पड़ाव में जैसे ठहर सी गर्इ है। इसकी प्रस्तुतियों के स्थान दूसरे डिजीटल माध्यमों ने ले लिया है तथा यह स्थिति भी मुझे लम्बे समय से उकसा रही हैं कि इस कला परंपरा पर शोध हो इसमें नतून ऊर्जा प्रवाह के लिए, इस धोबऊ नाच परंपरा पर अब तक शायद ही कोर्इ शोध हुआ हो मेरे अपने संज्ञान में यह पहला शोध होगा जो इस कला परंपरा व इसके कर्मियों को देश रूपी पहचान के साथ इनके नए रास्ते खोजने के प्रयास की शुरूआत करेगा। इस कला परंपरा की निरन्तर यात्रा के लिए।
     अत: धोबऊ नाच की यात्रा और इसकी पारंपरिक शैली पर मैं शोध करना चाह रही हूँ जो इस कला परंपरा की अब एक जरूरत बन गर्इ है। इसकी वर्तमान सिथति को देखते हुए तथा इण्डिया फाउण्डेशन फार द आर्टस, बैंगलोर, के आर्टस रिसर्च एण्ड डाक्यूमेन्टेशन प्रोपोजल स्कीम के तहत इस शोध को सफल बनाने के लिए हम सहायता प्राप्त करने के लिए शोध का प्रोपोजल आपके समक्ष रख रहीं हूँ, ताकि इस कार्य योजना को एक रूप दिया जा सके।


धोबऊ नाच का परिचय
भारत के लगभग लोक-कथा, नृत्य शैलियों का स्वरूप कहीं न कहीं तथा उनके तत्व आपस में खूब मेल खाते हैं। पर इनका प्रस्तुति, विषय, स्थान, अवसर भिन्न-भिन्न हैं। यहाँ तक कि प्रस्तुतिकर्ताओं को जातिगत वर्गीकरण भी हैं। धोबऊ नाच जो मुख्यत: दलित समुदाय के धोबी वर्ग में इस लोक परंपरा का चलन रहा है, पर वर्तमान में यह कला परंपरा भी अपने असितत्व के संकट से आखि़र जूझ रही है। धोबऊ नाच लोक कहानियों, गीतों को अपना आधार बनाकर कथा-गायन नृत्य करते हैं। अपने नृत्य भंगिमाओं के साथ कुछ दशक पहले इसमें एक नर्इ शैली का समावेश हुआ जिसको मैं यह कह सकती हूँ कि तात्खनीक इम्प्रोवाइजेशन के साथ कहानी का वाचन नृत्य भंगिमाओं के साथ इसमें यह मिश्र हुर्इ शैली पूर्वांचल की बिरहा शैली का अपना प्रभाव है।
     इन इम्प्रोवाइज कहानियों को जब प्रस्तुत किया जाता है गीत और नृत्य के साथ तब धोबऊ नाच के अनुसार इसका नाम ललचारी हो जाता है। जो धोबऊ नाच की एक गायन शैली भी है। धोबऊ नाच को प्रस्तुत करने वालों की एक टोली होती जिसमें अलग-अलग प्रकार के सदस्य होते हैं जैसे संगीत यंत्रों को बजाने वाले, नृत्य करने वाले तथा कहानी वाचकगायन वाले, इनका रोजगारी पेशा धोबऊ नाच होता है एवं इसके साथ ही साथ वो अपना जातिगत पेशा कपड़ों की धुलार्इ करना और किसानी भी है।
     इनके प्रस्तुति तत्वों में मुख्य शारीरिक क्रियात्मक मुद्ऱाऐं, कथा गायन, वर्तमान स्थितियों पर तात्खनीक इम्प्रोवाइजेशन, पारंपरिक वस्त्र विन्यास तथा रूप सज्जा होता है। इन सभी तत्वों का समागम इनकी प्रस्तुतियों में उपलब्धता के अनुसार दिखार्इ पड़ता है, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के हिस्सों में जैसे बलिया, मऊनाथ, भंजन, आजगढ़, गाजीपुर, सहतवार तथा इन जिलों से जोडि़त ग्रामों में भी एवं बिहार के माधेपुरा, छपरा, बंगरा, दाऊतपुर आदि जिलों एवं ग्रामों में धोबऊ नाच परंपरा रही है।
धोबऊ नाच परम्परा  का निर्माण
     धोबी समुदाय का जातिगत पेशा कपड़ो की धुलार्इ रहा है, अपने इस पारंपरिक पेशे को करने के लिए ये अपने गदहों और खच्चरों पर सवारी करते हुए कोसों-कोसों दूर के अपने ग्राहकों के कपड़ो को लाते व उनको धुलते प्रेस  करते  तथा पुन: वापस करने जाते।
     इनके इस पारंपरिक पेशे के अलावा इनका बंधुआ मजदूरी  का भी तरह तरह के काम हुआ करते थे जैसे कि अपने गदहों तथा खच्चरों पर रशोर्इ के लिए लकडि़यां पहुँचाना आदि।
जमीन्दारों के खेतो का बोझ खलिहानों तथा उनके निवासों पर पहुँचाना भी साथ जुड़ा रहा।
     इन सभी मज़दूरियों के विनिमय धोबियों को ज़मीदारों से कुछ अनाज व पुराने कपड़े मिलते थे जिससे यह समुदाय अपना भरण-पोषण करता था।
     लगभग अठठारहवीं शताब्दी के अन्त के आस पास तक इनके पास कपड़ो के धुलार्इ का कार्य बढ़ने लगा। कपड़ों को धुलार्इ के लिए ये कुछ निम्न प्रकार के वस्तुओं का उपयोग करते थे। वाशिंग कैमिकल्स के स्थान पर जैसे भेड़ से प्राप्त लेडि़यां और बंजर जमीन की मिटटी का मुख्य रूप से वाशिंग पाउडर के रूप में इस्तेमाल करते थे जिसको रेह कहा जाता है।
भेड़ों के लेडि़यों को ये एक कपड़े के पोटले में बांध कर पानी में घंटो भिगा कर रखते थे। फिर इस पानी में रेह को मिलाकर झाग वाला पानी तैयार करते। अब इसमें कपड़ों को लगभग रात भर भीगा कर रखा जाता था और सुबह धोबी एक ग्रुप बनाकर घाट पर पहुँचते और पत्थर पर कपड़ों को पटकते हुए गाना गाकर कपड़ों की धुलार्इ करते थे। 
     ये  वहीं  गाने थे जो आगे  चलकर  धोबऊ नाच  में शामिल हुए इन गानों के विषय मुख्य रूप से वो थे जिनमें नायक अपनी नायिका को गंगा नदी के किनारे लगने वाले मेले में साथ चलने का निवेदन करते है। (बलिया में गंगा के किनारे आज भी कार्तिक माह में ददरी का मेला लगता है।) कुछ गाने  तो ऐसे  भी  थे जो  घाट पर  घटने  वाले घटनाओं को लेकर गाया जाता था। इन सभी गानों के प्रत्येक वाक्य के बाद हूँ की ध्वनी निकलती है। क्योंकि जब कपड़ा पत्थर पर पटकते है तो काफी ताकत की जरूरत होती है।
यानी हम यह बोल सकते है कि धोबऊ नाच की परंपरा के एकदम पहले की शुरूआत गानों से हुर्इ जहां कोर्इ नाच नही था। जिसकों धोबऊ गान कहा जा  सकता है, केवल इन गानों की ही श्रृंखला थी।
उन्नीसवीं शती के आरंम्भ में इन गानों के साथ-साथ कुछ नाटकीय ढंग से धोबऊ नाच की अपनी यात्रा इस तरह आरंभ हुर्इ।
कपड़े धोने के लिए वाशिंग कैमिकल के रूप में जो धोबी समुदाय                     थे ग्रुप बंजर जमीन को खोजने तथा वहां कि मिटटी जिसको धोबी         समुदाय रेह कहता है। लाने जाते तो कर्इ सप्ताह लगते। अपनी लम्बी यात्रा की थकावट को दूर करने के लिए अपने विनोदन के लिए उन गानों  को गाते जाते कपड़े धुलते समय घाट पर गाया करते है।
     इन गानों को गाते-गाते वो अभिनय भी करने लगे जिसमें  गदहोंखच्चरों जैसे मूवमेन्ट करते तथा अलग-अलग जानवरों जैसा व्यवहार कर एक स्वांग रचाते। यहां धोबऊ नाच धीरे-धीरे अपने  स्वरूप के निर्माण में दूसरे चरण पर था जहां  गानों के साथ मुवमेन्ट  तथा नाटकीय हाव भाव आने लगे।
     इसी प्रदर्शन में धीरे-धीरे धोबी समुदाय का अपना धोबऊ नाच का व्याकरण तथा शैली विकसित होने लगी जिसमें वादय यंत्रों जैसे बड़े ढोल, कसावर ने स्थान प्राप्त किया।
     धोबऊ नाच अब अपने नए स्वरूप के साथ धोबी समुदाय में शादियों में प्रदर्शन होने लगे  तथा इतना लोकप्रिय हुआ कि जमीनदारों तथा अन्य उच्च वर्ग का शादियों में भी इनका प्रदर्शन शुरू हो गया जहां पर धोबऊ नाच दल बनने लगे तथा मास्टरों उस्तादों ने अपने आस-पास के रूचि रखने वाले धोबियों को भी इसका प्रशिक्षण मिलने लगा।
     बहुत आश्चर्य की बात यह भी है कि जब धोबऊ नाच का दल अपने गदहों / खच्चरों पर सवार होकर किसी ज़मीनदार के घर शादी पर पहुँचते अपने प्रदर्शन के लिए तो दूसरे कर्इ जातियों के लोग इकठठा हो जाते इनका प्रदर्शन देखने के लिए यह प्रदर्शन खुले मैदान में आयोजित किया जाता जो कि शाम  से लेकर आधी रात तक चलता।
समुदाय में धोबऊ नाच को करने की एक लालसा यहां यह भी थी कि दूसरे उच्चवर्णो अथवा ज़मींदारों की शादी में इसके प्रदर्शन कर्ताओं को प्रदर्शन के  पश्चात वह पकवान भी खाने को मिलते जिनका इन्होनें केवल नाम ही सु न  रक्खा था धोबी समुदाय में यह कारण भी कहीं न कहीं अपना असर रखता है धोबऊ नाच प्रदर्शन  के लिए  ज़मींदरों  की शादियों में।
धोबऊ नाच को ज़मींदारी तथा उच्चवर्ण के समुदायों में इस नाच को धोबिया  नाच भी कहते है। यह नाच उन्नीसवीं शती के मध्य़़ पहुँचते-पहुँचते इतना लोकप्रिय हो गया था कि धोबऊ नाच को प्रदर्शन करने वालों को होली के दिन  गाँव  में बुलाया जाता था और गांव के श्रेष्ठ व्यक्ति के घर के सामने  पूरे गाँव  के लोग इकट्ठा  होकर इस प्रदर्शन से विनोदन प्राप्त करते थे।
     धोबऊ नाच पुरूष प्रधान पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं की श्रेणी में अपना  स्थान रखता है। जिसने अपने स्वरूप को बहुत ही जल्दी निर्माण और नाटकीय ढंग से अपनी पारंपरिक यात्रा का पथ संचालित किया परन्तु कालचक्र में इसकी गती ने ठहराव पकड़ लिया है।
     और यह परंपरा अपनी आने वाली जिन्दगी के रास्ते पर चलने के लिए उतावली आशा भरे नयनों के साथ काल के सीने पर खड़ी है।  

ब्रेक के बाद..........




                           ज़्यादातर चैनल मे हर दो मिनट बाद यह देखने को मिलता है कि एंकर बोलेगी मिलते है एक छूटे से ब्रेक के बाद , ब्रेक के खबरों का सिलसिला जारी रहेगा....लेकिन खबरों का सिलसिला आज तक जारी न रह पाया , फिर से दो मिनट बाद एंकर कि वही एक बात मिलते है ब्रेक के बाद..............................
         टीवी चैनलो मे एक होड सी लगी है, खबरे कम बिज्ञापन ज्यादा और कौन चैनल कितना बिज्ञापन लेकर कितना पैसा बना ले यही उनकी पहली प्राथमिकता रहती है। दर्शक टीवी के सामने बैठे – बैठे खीझ जाता है और रिमोट लेकर दूसरा चैनल बदलता है तो उस पर भी वही हाल, हर समाचार और धारावाहिकों मे आधे घंटे मे लगभग 5-6 बार ब्रेक होता है, और आधे घंटे के कार्यक्रम मे 15 मिनट बिज्ञापन दिखाया जाता है।
                 अब इन सब से दर्शको को मुक्ति दिलाने के लिए ट्राई ( भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण ) ने एक अहम फैसला लिया है, ट्राई ने कहा है कि कोई भी चैनल वाले एक घंटे के कार्यक्रम मे सिर्फ 12 मिनट  के लिए ही ब्रेक ले सकता है। अब यह सवाल उठता है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस नियम को सही से लागू कर पाएगा, क्यूंकि ट्राई के इस फैसले के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कहा था कि प्रसारको कि राय लिए बिना यह नियम लागू नहीं किया जा सकता है। 

राजेश खन्ना का आखिरी सलाम.............



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